Real story par adharit Film sako 363 bishnoi samaj ke khejadli balidan ki amar kahani

बड़ी खुशखबरी: फिल्म “साको 363” जल्द होगी रिलीज
बिश्नोई समाज के लिए यह गर्व और खुशी का पल है। लंबे संघर्ष और विवादों के बाद फिल्म “साको 363”, जो खेजडली बलिदान की सत्य घटना पर आधारित है, ।
अब सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) से मंजूरी के बाद जल्द ही सिनेमा घरों में प्रदर्शित होगी।
यह फिल्म बिश्नोई समाज की पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणादायक गाथा और अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में दिए गए अद्वितीय बलिदान पर आधारित है।
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धन बल हार गया, सत्य जीत गया
फिल्म “साको 363” की रिलीज को रोकने के लिए धनबल का इस्तेमाल करने और कानूनी विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई।
लेकिन सत्य की विजय हुई, और बिश्नोई समाज के अग्रणी व्यक्तित्वों और भामाशाहों की दृढ़ता के कारण फिल्म को सेंसर बोर्ड से मंजूरी मिल गई।
कौन थे विरोधी?
जालौर और सांचौर क्षेत्र से यह खबर उभरी है कि कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों ने फिल्म की रिलीज को रोकने के लिए धनबल का सहारा लिया था।
हालांकि, समाज के जागरूक और समर्पित लोगों ने न्याय के लिए संघर्ष किया और इसे सफल बनाया।
जल्द ही इन विरोधियों के नाम का खुलासा होने की संभावना है।
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खेजड़ली बलिदान: एक प्रेरणादायक कहानी
खेजड़ली बलिदान की घटना
वर्ष 1730 में राजस्थान के खेजड़ली गांव में अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में बिश्नोई समाज के 363 लोगों ने खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी।
इस घटना को इतिहास में पर्यावरण संरक्षण के लिए दिए गए सबसे बड़े बलिदानों में गिना जाता है।
अमृता देवी का कथन, “सिर साठे रूख रहे, तो भी सस्तो जाण” पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है।
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फिल्म साको 363: निर्माण और विवाद
मुख्य विवरण:
निर्देशक: कल्याण सीरवी और सूरज बिश्नोई
निर्माता: कल्याण सीरवी और सुरेश बिश्नोई
सेंसर प्रमाणपत्र: 43802
प्रमुख कलाकार: सूरज बिश्नोई
स्नेहा उलाल ने निभाया अमृता देवी बिश्नोई का किरदार।
सहायक भूमिकाओं में अनुभवी कलाकार शामिल हैं।
विवाद और कानूनी प्रक्रिया
फिल्म की प्रामाणिकता और बिश्नोई समाज की परंपराओं को तोड़-मरोड़ कर दिखाने के आरोप लगाकर फिल्म पर अस्थायी रोक लगाई गई थी।
न्यायालय का हस्तक्षेप:
विवादों को लेकर राजस्थान हाई कोर्ट में मामला चला, लेकिन बाद में समाज के नेताओं और निर्माताओं के बीच समझौता हो गया।
फिल्म सेंसर बोर्ड से पास:
मुंबई सेंसर बोर्ड ने फिल्म को समीक्षा के बाद रिलीज के लिए मंजूरी दी।
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फिल्म का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
1. पर्यावरण संरक्षण का संदेश
“साको 363” न केवल एक ऐतिहासिक घटना पर आधारित फिल्म है, बल्कि यह आधुनिक समाज को पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा भी देती है।
2. बिश्नोई समाज का योगदान
फिल्म बिश्नोई समाज की परंपराओं, उनके पर्यावरण प्रेम और साहसिक बलिदान को दुनिया के सामने लाने का प्रयास करती है।
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फिल्म कब होगी रिलीज?
फिल्म को सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) ने पास कर दिया है, और इसे जल्द ही भारत भर के सिनेमा घरों में रिलीज किया जाएगा।
प्रमोशन और चर्चा
फिल्म के ट्रेलर और प्रचार ने पहले ही दर्शकों के बीच उत्साह पैदा कर दिया है।
यह न केवल राजस्थान बल्कि पूरे भारत के पर्यावरण प्रेमियों के लिए खास महत्व रखती है।
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निष्कर्ष
“साको 363″ बिश्नोई समाज के साहस और पर्यावरण के प्रति उनके बलिदान की गाथा है।
यह फिल्म न केवल एक ऐतिहासिक घटना का चित्रण करती है, बल्कि आज के समय में पर्यावरण संरक्षण के महत्व को भी दर्शाती है।
यह फिल्म बिश्नोई समाज के लिए गर्व का विषय है और हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा।
जल्द ही बड़े पर्दे पर आने वाली इस फिल्म को जरूर देखें और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाएं। ”
साको 363″: सत्य की जीत और प्रेरणा की गाथा।
1. “साको 363”: खेजड़ली बलिदान पर आधारित बिश्नोई समाज की कहानी
2. जल्द रिलीज होगी “साको 363”, जानिए बिश्नोई समाज के 363 बलिदानियों की गाथा
3. “साको 363”: अमृता देवी बिश्नोई का बलिदान अब बड़े पर्दे पर
4. पर्यावरण संरक्षण की सच्ची कहानी: फिल्म “साको 363”
5. बिश्नोई समाज की गौरव गाथा: फिल्म “साको 363” जल्द होगी रिलीज
6. “साको 363”: पर्यावरण बचाने के लिए दिया गया सबसे बड़ा बलिदान
7. अमृता देवी और खेजड़ली बलिदान पर बनी फिल्म “साको 363”
8. बिश्नोई समाज की प्रेरणादायक कहानी: जल्द आ रही है फिल्म “साको 363”
9. “साको 363”: प्रकृति की रक्षा के लिए बिश्नोई समाज का त्याग
10. फिल्म “साको 363”: सत्य की जीत और पर्यावरण संरक्षण की मिसाल
बिश्नोई समाज की मांग: फिल्म “साको 363” को टैक्स फ्री किया जाए
बिश्नोई समाज ने सरकार से अपील की है कि फिल्म “साको 363”, जो खेजड़ली बलिदान और पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणादायक गाथा पर आधारित है, ।
फिल्म को देशभर में टैक्स फ्री किया जाए।।
यह फिल्म न केवल ऐतिहासिक घटना का चित्रण है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ मुहिम को भी बढ़ावा देती है।
फिल्म के टैक्स फ्री होने की मांग के पीछे मुख्य कारण
1. पर्यावरण संरक्षण का संदेश:
“साको 363” उन 363 बिश्नोई बलिदानियों की कहानी है,।
जिन्होंने खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।
यह फिल्म पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम है।
इसे टैक्स फ्री करने से अधिक से अधिक लोग इस प्रेरणादायक कहानी को देख सकेंगे और इससे सीख ले सकेंगे।
2. ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ मुहिम:
आज के समय में जब ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय संकट गंभीर होते जा रहे हैं, ।
इस तरह की फिल्में समाज में जागरूकता फैलाने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाने की प्रेरणा देती हैं।
3. इतिहास और संस्कृति को संरक्षित करना:
“साको 363” भारतीय इतिहास की एक अद्वितीय घटना पर आधारित है।
इसे टैक्स फ्री करना बिश्नोई समाज के ऐतिहासिक योगदान को सम्मान देने का एक तरीका होगा।
4. सामाजिक जागरूकता:
फिल्म को टैक्स फ्री करने से निम्न और मध्यम वर्ग के लोग भी इसे आसानी से देख पाएंगे, जिससे इसका संदेश हर तबके तक पहुंचेगा।
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बिश्नोई समाज की अपील
बिश्नोई समाज का कहना है कि:
“यह केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि पर्यावरण बचाने के लिए दी गई दुनिया की सबसे बड़ी प्रेरणा है।
यदि यह फिल्म टैक्स फ्री होगी, तो पूरे देश और विश्व में इसे देखने वालों की संख्या बढ़ेगी, और लोग पर्यावरण संरक्षण के प्रति अधिक जागरूक होंगे।”
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सरकार से अनुरोध
राज्य और केंद्र सरकार से अनुरोध है कि इस फिल्म को राष्ट्रीय स्तर पर टैक्स फ्री किया जाए।
सरकार को इस फिल्म के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को बढ़ावा देने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम उठाना चाहिए।

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निष्कर्ष
फिल्म “साको 363” बिश्नोई समाज की एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक गाथा है,।
जो हर व्यक्ति को पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराती है।
इसे टैक्स फ्री करना न केवल इस फिल्म के उद्देश्य को समर्थन देना होगा, बल्कि यह समाज और पर्यावरण के हित में एक बड़ा कदम साबित होगा।
> “सिर साठे रूख रहे तो भी सस्तो जाण” – इस संदेश को हर व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए सरकार को फिल्म “साको 363” को टैक्स फ्री करना चाहिए।
साको 363: अमृता की खेजड़ी – बिश्नोई समाज के बलिदान की कहानी
फिल्म “साको 363: अमृता की खेजड़ी” बिश्नोई समाज की पर्यावरण संरक्षण की गाथा और अमृता देवी बिश्नोई के अद्वितीय बलिदान पर आधारित है।
यह फिल्म पर्यावरण और संस्कृति को समर्पित भारतीय सिनेमा की एक उत्कृष्ट कृति मानी जा रही है।
फिल्म का निर्देशन और निर्माण बड़े पैमाने पर हुआ है, और इसमें बिश्नोई समाज के स्थानीय लोगों के साथ-साथ प्रसिद्ध कलाकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
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फिल्म से जुड़ी मुख्य बातें
1. कहानी का आधार:
फिल्म “साको 363” 18वीं सदी के राजस्थान की एक सच्ची घटना पर आधारित है।
यह कहानी उस समय की है, जब खेजड़ी के पेड़ों की कटाई रोकने के लिए अमृता देवी बिश्नोई ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।
उनके नेतृत्व में बिश्नोई समाज के कुल 363 लोगों ने पर्यावरण संरक्षण के लिए अपने प्राण त्याग दिए।
2. निर्देशक और निर्माता:
फिल्म का निर्देशन कल्याण सीरवी ने किया है और इसे सूरज बिश्नोई ने संयुक्त रूप से प्रोड्यूस किया है।
इस फिल्म के निर्माण में राजस्थान के कई स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों और तकनीशियनों ने योगदान दिया है।
3. शीर्ष कलाकार:
स्नेहा उल्लाल: अमृता देवी बिश्नोई के किरदार में।
गरिमा अग्रवाल: कान्हा रानी के रूप में।
मिलिंद गुणाजी: दीवान गिरधर दास भंडारी।
बृज गोपाल: भेरजी।
गैवी चहल: रामोजी बिश्नोई के रूप में।
अन्य कलाकारों में संजय गडई, विमल उनियाल, नैनासिंह, और अनामिका शुक्ला शामिल हैं।
4. फिल्म की शूटिंग लोकेशन:
फिल्म की शूटिंग राजस्थान के ऐतिहासिक और प्राकृतिक स्थानों जैसे जोधपुर, नागौर, अजमेर, पाली, बाड़मेर और उदयपुर के गांवों में की गई।
फिल्म में बिश्नोई समाज की संस्कृति और परंपराओं को जीवंत रूप से प्रदर्शित करने के लिए स्थानीय ग्रामीणों को भी शामिल किया गया।
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विशेष योगदान: बिश्नोई समाज का सहयोग
1. समाज के सदस्य और योगदान:
इस फिल्म के निर्माण में बिश्नोई समाज के कई प्रमुख व्यक्तियों ने आर्थिक और नैतिक सहयोग दिया।
363 सदस्यों ने 1-1 लाख रुपये का आर्थिक सहयोग किया, जो फिल्म के नाम को भी दर्शाता है।
प्रमुख योगदानकर्ताओं में समस्त जागरूक बिश्नोई, पूर्व संसदीय सचिव लादूराम बिश्नोई, मुकाम पीठाधीश्वर आचार्य स्वामी रामानन्द, और पींपासर महंत स्वामी भक्तिस्वरूप शामिल हैं।
2. स्थानीय कलाकारों की भागीदारी:
फिल्म में राजस्थान के नागौर, अजमेर, पाली, जोधपुर, और बाड़मेर से कई कलाकारों को अभिनय के लिए चुना गया, ताकि फिल्म में वास्तविकता का समावेश हो।
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फिल्म का सामाजिक और पर्यावरणीय महत्व
“साको 363” एक ऐसी फिल्म है जो पर्यावरण संरक्षण, ग्लोबल वार्मिंग और सामाजिक चेतना जैसे विषयों को प्रभावी रूप से प्रस्तुत करती है।
यह फिल्म प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए त्याग और बलिदान के महत्व को दर्शाती है।
यह बिश्नोई समाज की परंपरा, धार्मिक आस्था, और प्रकृति प्रेम को एक वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करती है।
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फिल्म का निर्माण और समर्थन:
फिल्म के निर्माण के लिए बिश्नोई समाज के सदस्यों ने न केवल आर्थिक मदद दी, बल्कि इस फिल्म की कहानी को सही ढंग से प्रस्तुत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राजस्थान के पर्यावरण प्रेमी नेताओं और आध्यात्मिक गुरुओं ने भी फिल्म को समर्थन दिया।
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निष्कर्ष
फिल्म “साको 363: अमृता की खेजड़ी” केवल एक मनोरंजन फिल्म नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास और पर्यावरण संरक्षण के लिए किए गए बिश्नोई समाज के अद्वितीय बलिदान की कहानी है।
इसे देखना हर व्यक्ति के लिए प्रेरणादायक होगा।
“सिर साठे रूख रहे तो भी सस्तो जान।।
इस संदेश को दुनिया भर में फैलाने के लिए यह फिल्म एक महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी।
साको 363: एक ऐतिहासिक बलिदान की गाथा
साल 1730 की एक अमर घटना, जिसने राजस्थान के बिश्नोई समाज को पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक के रूप में स्थापित किया,।
आज साको 363 फिल्म के माध्यम से जीवंत हो उठी है।
यह कहानी न केवल बलिदान की है बल्कि प्रकृति और धर्म के अद्भुत संगम की भी है।
घटना का केंद्र राजस्थान के जोधपुर जिले का खेजड़ली गांव था।
महाराजा अभयसिंह के आदेश पर उनके सैनिक खेजड़ी के पेड़ों को काटने के लिए पहुंचे।
खेजड़ी के पेड़ बिश्नोई समाज के लिए मात्र वृक्ष नहीं, बल्कि जीवन और आस्था का हिस्सा थे।
बिश्नोई धर्म के प्रवर्तक गुरु जंभेश्वर ने अपने अनुयायियों को प्रकृति के संरक्षण की शिक्षा दी थी, और यह समाज उसे अपनी आत्मा का हिस्सा मानता था।
जब सैनिकों ने पेड़ों को काटना शुरू किया, तब अमृता देवी ने उनके सामने डटकर खड़े होते हुए कहा, “सिर साटे रुख रहे तो भी सस्ता जाण।” (अर्थात, “सिर कट जाए, लेकिन वृक्ष बचा रहे तो यह भी सस्ता सौदा है।”)
अपनी बात को सिद्ध करते हुए उन्होंने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
उनके इस बलिदान के साथ 363 बिश्नोई पुरुषों, महिलाओं, और बच्चों ने भी एक-एक कर अपने प्राण त्याग दिए, लेकिन वृक्षों को कटने नहीं दिया।
साको 363 फिल्म इन्हीं 363 लोगों के बलिदान की कहानी को पर्दे पर साकार करती है
। यह फिल्म न केवल उस ऐतिहासिक घटना का स्मरण कराती है, बल्कि यह भी बताती है कि पर्यावरण की रक्षा के लिए बिश्नोई समाज ने किस हद तक बलिदान दिया।
यह गाथा आज के समय में बेहद प्रासंगिक है, जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकटों का सामना कर रही है।
साको 363 सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है, जो यह संदेश देती है कि प्रकृति हमारी संस्कृति और अस्तित्व का आधार है।
खेजड़ली के इस बलिदान की कहानी हर व्यक्ति को अपनी धरती और पर्यावरण की रक्षा के प्रति जागरूक करती है
। साको 363 बिश्नोई समाज के उस गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति प्रेम और त्याग का संदेश देता रहेगा।
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